Rai Dhanpat Singh Granthawali
Introductions Rai Dhanpat Singh Granthawali
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राय धनपत सिंह निंदाना जीवन परिचय:अपने जीवन-काल में ही लोकप्रियता की लहरों को छूने वाले रिया धनपत सिंह निंदाना का जीवन हरियाणा के लोक के लिए किसी भी परिचय का मोहताज नहीं है। वे अपने जीवन में सांग के पर्याय बन गये थे। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को निम्नलिखित उदाहरणों में समझा जा सकता है -
जन्म एवं माता-पिता -
राय धनपत सिंह का जन्म 9 अगस्त, 1912 को वर्तमान देहरादून जिले के गांव निंदाना में पिता श्री चंदाराम और माता श्रीमती भोली देवी के घर मिरासी जाति में हुए थे। हरियाणा में यह जाति मीर और डूम आदिम जनजाति भी जानी जाती है। मिरासी क्लास स्टेक के अंतर्गत आता है और वर्तमान समय में भीस्टार्ट दर्शन से अति पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत आता है। बैस्ट के सामूहिक स्वभाव के मामले में मिरासी जाति गायन के लिए अनुमति है। गायन कला इस जाति का अकस्मात् सामूहिक गुण है। राय धनपत सिंह ने अपने जन्मस्थान के बारे में बताया -
गरावड़ खरकड़ा मदीना बलंभा सब नाम,
तं सुनिए सीमा जोड़ के गाम,
खेड़ी, महम, भाण, सामायन गौरी,
फरमाना गुगाहेड़ी जाण गौरी,
खरक बंसी जायब भरण गौरी, बीच निंदा गम सै।।
राय धनपत सिंह हरियाणा में एक ऐसी जाति से संबंधित संख्या बहुत कम है। अन्य सुपरस्टार्स में भी यह अति पिछड़ा हुआ है। तो इस जाति से जुड़े ज्ञान के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाना एक चुनातिपूर्ण काम था। हरियाणा में जहां एक और बाजे भगत, लक्ष्मीचंद, चंद्रलाल बादी, मजीराम, रामकिशन व्यास आदि का अधूरा जाम था, वहीं अपने सांगों की उत्कृष्टता, अभिनय कौशल, सुरीली गायन, प्रभावशाली आवाज और विलक्षण प्रतिभा से रिया धनपत सिंह ने अपनी अमित छाप दिखाई, जहां उन्होंने अपनी अलग जगह बनाई। जहां एक और राय धनपत सिंह के विराट व्यक्तित्व का द्योतक है, वहीं हरियाणा की जनता की विचारधारा का भी परिचय है। हरियाणा की सांग-प्रेमी जनता ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया।
शिक्षा -
राय धनपत सिंह की जाति में वर्तमान समय में भी शिक्षा का अभाव है। उन्होंने उस समय मिडल तक की शिक्षा ग्रहण की थी जो आपके लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। उस समय मिडल पास होना ही बड़ी बात मानी जाती थी। स्कूल में आते-जाते उनका ध्यान संग-रागनियों की ओर देखा गया -
जमुवा नाम देश म्हं कढऱ्या, धनपत सिंह मध्य तक पढऱया
अक्खन काना चित पै चढ़ण्या चाली भूल कलाम मेरा।
तू तै पहले मैं जंगा इब दतना आदेम हराम मेरा।
राय धनपत सिंह ने मिडिल क्लास से स्कूल तक पढ़ाई की और उसके बाद सांग के क्षेत्र में उन्हें अपनी ओर खींच लिया। उन्होंने कहा कि अपने जीवन का लक्ष्य बनाने के लिए और अवसर का ज़िक्र करते हुए एक रागनी में लिखा है कि मिडल तक आओ-आते उसके गाने से प्यार हो गया था। फिर गैसोलीन शिक्षा क्या बोली थी। सीधे जमुवा मीर के पास के क्षेत्र और उनके चरणों में नामांकन करके उन्हें अपना गुरु धारण कर लिया गया। स्वयं राय जी के शब्दों में –
नगर निंदाने तै चलकै मैं पढ़न मदीने अग्या।
स्लेट फोड़ दी तख्ती तोड़ दी बस्ता उड़े बगाग्या।
हैडमास्टर न्यू बोल्या तेरा बहम कोण सा लाग्या।
मैं बोल्या गुरु माफ करो मेरै इश्क गान का जगाया।
धनपत सिंह समर जमुवा फेर जोत देबी की बालौंग।
गुरु -
उस समय देहरादून जिले के सुनारियां गांव में जमुवा मीर जी का बड़ा नाम हुआ। सांग और रागनी विधान सभा में जमुवा मीर की साझीदारी हो गई थी। वे भी बने थे और जीते भी थे। राय धनपत सिंह अपने अध्ययन के दिनों में ही अपने संपर्क में आ गए और अपने गुरु के साथ पिछले सत्रह वर्ष की आयु में अपना सांग का बेड़ा बांध लिया। जमुवा मीर को अपने गुरु बनाने के संबंध में वे धोखा दे रहे हैं - देव तेन परे नाम चल्या गया जहां पै बसता सुनारी गाम।
उड़े देस्सा और मामन देखै कवि देखै जमवा मीर।
रामभक्त और राजू देखै मैया देखै सबके पीर।
वहां जमुवा का चेल्या बंग्या मेरई ज्ञान का लग्या तीर।
धनपत सिंह हुसियाराँ कै इसे छंद मिलेंगे छेड़े।।
देसराज और मामन भी जमुवा मीर के शिष्य थे। उन्होंने भी उन्हें अपना गुरु धारण कर लिया। राय धनपत जी अपने गुरु के प्रति पूर्ण रूप से कृतज्ञ हैं तथा वे स्वयं को समर्पित करके बने हुए हैं। वे यह कहते हैं कि एक व्यक्ति या कलाकार के रूप में उन्हें उनके गुरु के कारण ही मिला। वे धनपत से धनपत सिंह या राय साहब हो गये -
इतना तलब रंग होग्या, राजा किस लायक होग्या।
धनपत तैं धनपत सिंह होग्या, दिल तैं जिब जमवा मनाया गया।
राय धनपत सिंह अपने गुरु को ज्ञान का भंडार मानते हैं -
धनपत सिंह नाटक छट्या, भेद सब जमुवा धोराई पट्या।
हे री मेरी मां ओडै घाटा ना गुण ज्ञान का।
जड़ते विद्या का भंडार हो ।।
