Rai Dhanpat Singh Granthawali

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A.K.Sharma
v1.1.1 (2) • Updated Dec 04, 2025
4.0 ★
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姓名 Rai Dhanpat Singh Granthawali
安卓版本 5.1+
出版商 A.K.Sharma
类型 BOOKS AND REFERENCE
尺寸 16 MB
版本 1.1.1 (2)
最后更新于 2025-12-04
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Rai Dhanpat Singh Granthawali

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निंदाना जीवन परिचय:
अपने जीवन-काल में ही लोकप्रियता की बुलंदियों को छू लेने वाले राय धनपत सिंह निंदाना का जीवन हरियाणा के लोक के लिए किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वे अपने जीवन में सांग के पर्याय बन चुके थे। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को निम्न बिंदुओं में समझा जा सकता है –
जन्म एवं माता-पिता -
सिंह का जन्म 9 月 1912 年में पिता श्री चंदाराम और माता श्रीमती भोली देवी के घर मिरासी जातिमेंहुआ। हरियाणा में यह जाति मीर और डूम आदि नामों से भी जानी जातीहै। मिरासी जाति अनुसूचित जाति के अंतर्गत आती है और वर्तमान समय में भी शैक्षिक दृष्टि से अति पिछड़ी जातियों में आती है। जातियों के सामूहिक स्वभाव के मामले में मिरासी जाति गायन के लिए विख्यात है। गायन कला इस जाति का अकस्मात् सामूहिक गुण है। धनपत सिंह ने अपने जन्मस्थान के बारे में बताया है –
गरावड़ खरकड़ा मदीणा बलंभा सब नाम,
तँ सुणिए सीम जोड़ केगाम,
खेड़ी, महम, भैण, सामायण गौरी,
फरमाणा गूगाहेड़ी जाण गौरी,
खरक बैंसी जायब भराण गौरी, बीच निंदाणा गाम सै।।
धनपत सिंह हरियाणा में एक ऐसी जाति से संबंधित थे जिसकी संख्या बहुत कम है। अन्य अनुसूचित जातियों में भी यह अति पिछड़ी हुईहै। सो इस जाति से आकर सांग के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाना एक चुनौतिपूर्ण काम था। हरियाणा में जहां एक और बाजे भगत、 लख्मीचंद、 चंद्रलाल बादी, मांगेराम, रामकिशन व्यास आदि का सिक्का जम चुका था, वहीं अपने सांगों की उत्कृष्टता,अभिनय कौशल,सुरीले गायन, असरदार आवाज और विलक्षण प्रतिभा से राय धनपत सिंह नेअपनी अमिट छाप छोड़ते हुए अपना अलग मुकाम बनाया। यह जहां एक औरराय धनपत सिंह के विराट व्यक्तित्व का द्योतकहै,वहीहरियाणाकीजनताकीस्वीकार्यताकाभी परिचायक है। हरियाणा की सांग-प्रेमी जनता ने उन्हें सिर आंखों बिठाया।
शिक्षा -
सिंह की जाति में वर्तमान समय में भी शिक्षा का अभाव ही है। उन्होंने उस समय मिडल तक की शिक्षा ग्रहण की थी जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी। उस समय मिडल पास होना ही बड़ी बात मानी जाती थी। स्कूलमेंआते-जातेउनकाध्यानसांग-रागनियोंकीओर उन्मुख हो गया –
जमुवानामदेशम्हंकढ़ऱ्या,धनपतसिंहमिडल तकपढ़ऱया
अक्खन काणा चित पै चढ़ऱ्या चाली भूल कलाम मेरा।
तेरे तै पहले मैं जांगा इब डटणा आड़े हराम मेरा ।
सिंहमिडलकक्षातकस्कूलमेंपढ़ेऔर उसके बाद सांग के क्षेत्र ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया। उन्होंने सांग को अपने जीवन का लक्ष्य बनाने का कारण व अवसर का जिक्र करते हुए एक रागणी में लिखा है कि मिडलतक आते-आते उसे गाने से प्रेम हो गया था। फिर स्कूली शिक्षा क्या मायने रखती थी। सीधे जमुवा मीर के पास पहुंचे और उनके चरणों में नमन करके उन्हें अपना गुरु धारण कर लिया। स्वयंरायजीकेशब्दोंमें –
नगर निंदाने तै चलकै मैं पढ़ण मदीने आग्या।
स्लेट फोड़ दी तख्ती तोड़ दी बस्ता उड़े बगाग्या ।
हैडमास्टर न्यूं बोल्या तेरै बहम कोण सा लाग्या।
मैं बोल्या गुरु माफ करो मेरै इश्क गाण का जाग्या ।
धनपत सिंह समर जमुवा फेर जोत देबी की बालूंगा।
गुरु -
उस समय रोहतक जिले में सुनारियां गांव में जमुवा मीर जी का बड़ा नाम हुआ। सांग औररागणी विधा में जमुवा मीर की प्रसिद्धि हो चुकीथी। वे लिखते भी थे और गाते भी थे। धनपतसिंहअपनेअध्ययनकेदिनोंमेंहीउनके संपर्क में आ गए और उनको अपना गुरु बनाकर मात्र सत्रह वर्षकी आयु में अपना सांग का बेड़ा बांध लिया। जमुवा मीर को अपना गुरु बनाने के संबंध में वे लिखते हैं - रोहतक तें परे नैं चल्या गया जहां पै बसता सुनारी गाम ।
उड़े देस्सा और मामन देखै कवि देखै जमवा मीर।
देखै मांगे देखै सबके पीर।
वहाँ जमुवा का चेल्या बणग्या मेरै ज्ञान का लाग्या तीर ।।
धनपत सिंह हुशियाराँ कै इसे छंद मिलेंगे छीदे ।।
देसराज और मामन भी जमुवा मीर के शिष्य थे। उन्होंने भी उन्हें अपना गुरु धारण कर लिया। गुरु के प्रति पूर्ण रूप से कृतज्ञ है तथा वे स्वयं को उन्हें समर्पित करके चलते हैं। वे लिखते हैं कि एक व्यक्ति या कलाकार के रूप में उन्हें पूर्णता उनके गुरु के कारण ही मिली। वे धनपत से धनपत सिंह याराय साहब हो गए -
इज्जततलबरंगहोग्या,राजाकिसढंगहोग्या।
धनपततैंधनपतसिंहहोग्या,दिलतैंजिबजमवा मनाया।
धनपत सिंह अपने गुरु को ज्ञान का भंडार मानते है -
धनपत सिंह ड्रामा छाँट्या,भेद सब जमुवा धोरै पाट्या।
हे री मेरी माँ ओड़ै घाटा ना गुण ज्ञान का।
जड़े विद्या का भंडार हो ।।
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