Rai Dhanpat Singh Granthawali
Introductions Rai Dhanpat Singh Granthawali
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निंदाना जीवन परिचय:अपने जीवन-काल में ही लोकप्रियता कं ऋऋब को छू लेने वाले राय धनपत सिंहनिंाा हरियाणा करियाणा के लोक के लिए किसीपरिचयट नहीं है। वह अपने जीवन में सांब केपनथबथबबपपपबप चुके थे। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को निम्न बिंदुओं में समझा जा सकता है –
जन्म एवं माता-पिता -
सिंह का जन्म 9 月 1912 年में पिता श्री चंदता श्रम श्रीमती भोली देवी के घर मिरासीजर हरियाणा मरियाणा में यह जाति मीर औरम।म मीर औरड भी जानी जातीहै। मिरासी जाति अनुत के अंतर्गत आती है और वर्तमान समय र्तमान समय म।मतं ऴययमं दृष्टि से अति पिछड़ी जातियों थइं थं जातियों कासामयों के सामूहिक स्वभावकेमावं मिरासी जाति गायन के लिए विख्यात िथ इस जाति का अकस्मात् सामूहिकग ने अपने जन्मस्थान के बारे में बताय
गरावड़ खरकड़ा मदीणा बलंभा सब नाम,
तँ सुणिए सीम जोड़ केगाम,
खेड़ी, महम, भैण, सामायण गौरी,
फरमाणा गूगाहेड़ी जाण गौरी,
खरक बैंसी जायब भराण गौरी, बीचािाा सै।।
धनपत सिंह हरियाणा में एक ऐसऴजांा ितत थे जिसकी संख्या बहुत कम है। अन्य अ जातियों में भी यह अति पिछड़ी हुईहै। सो इस जाति से आकर सांग के क्षेत्रमपपपथपपपपपपपप बनाना एक चुनौतिपूर्ण काम था। ारिर जहां एक और बाजे भगत、 लख्मीचंद、 चंदददद मांगेराम, रामकिशन व्यास आदि का यास. था, वहीं अपने सांगों की उत्कृष्टता,उ कौशल,सुरीले गायन, असरदार आवाजऔरऔरररररररर प्रतिभा से राय धनपत सिंह नइअपन अी निअपि छोड़ते हुए अपना अलग मुकाम बनाया। ाम बनाया औरराय धनपत सिंह के विराट व्यक्तिरििवव द्योतकहै,वहीहरियाणाकी जनताकीस्वीकार्यताकाभी परिचायक है। हरियाणा की सांग-प्रेरनतर उन्हें सिर आंखों बिठाया।
शिक्षा -
सिंह की जाति में वर्तमान समय मेमान समय मकं श स अभाव ही है। उन्होंने उस समयमिडल स मथमिडल त मतमतडल थ मतमतत ग्रहण की थी जो अपने आप में एक बड़ उस समय मिडल पास होना ही बड़ी बात त थी। स्कूलमेंआते-जातेउनकाध ्यानसांग-रागनियोंकीओर उन्मुख हो गया –
जमुवानामदेशम्हंकढ़ऱ्या,धनपतसिंिं तकपढ़ऱया
अक्खन काणा चित पै चढ़ऱ्या चाल
तेरे तै पहले मैं जांगा इब डटणा गा इब डमणा ा मेरा ।
सिंहमिडलकक्षातकस्कूलमेंपढ़थऔरर सांग के क्षेत्र ने उन्हें अपनी ओर ंर उन्होंने सांग को अपने जीवन का लक्ष्य बनाने का कारण व अवसर का जिक्र करते हुए एक रामममममत लिखा है कि मिडलतक आते-आते उस गया था। फिर स्कूली शिक्षा क्या माया कया थायत सीधे जमुवा मीर के पास पहुचचेऔर परुचऋ में नमन करके उन्हें अपना गँर स्वयंरायजीकेशब्दोंमें –
नगर निंदाने तै चलकै मैं पढ़ण मदीने आग्या।
स्लेट फोड़ दी तख्ती तोड़ दीबस्ता उा ।
हैडमास्टर न्यूं बोल्या तेरै बहम कोण सा लाग्या।
मैं बोल्या गुरु माफ करो मेरै इशककााााााााााा जाग्या ।
धनपत सिंह समर जमुवा फेर जोत दबबीब
गुरु -
उस समय रोहतक जिले में सुनारियां ा जमुवा मीर जी का बड़ा नाम हँआ।स विधा में जमुवा मीर की प्रसिद्धि हो चुकीथी। वे लिखते भी थे और गाते भी थे। धनपतसिंहअपनेअध्ययनकेदिनऋंमकंंउउऋं में आ गए और उनको अपना गुरु बनाकर रररररररररररररररररररररररररररररररररररररररररररररररररररररररररररररररर रर वर्षकी आयु में अपना सांग का बतब़ा ब जमुवा मीर को अपना गुरु बनाने के सं लिखते हैं - रोहतक तें परे नईं चलययययय बसता सुनारी गाम ।
उड़े देस्सा और मामन देखै कवि देखैखमममत
देखै मांगे देखै सबके पीर।
वहाँ जमुवा का चेल्या बणग्या म।रफ़थ। ााःथःःथ लाग्या तीर ।।
धनपत सिंह हुशियाराँ कै इसइटतद मथटतथतथतथतथतथतथतथतथतथतथतथटतथथतथतथतथतथतथतथतथतथतत ।।
देसराज और मामन भी जमुवा मीर केशयश उन्होंने भी उन्हें अपना गुरु धारर गुरु धारर र गुरु के प्रतर पूर्ण रूप से कृतज्ञ हेतथतथञ थ स्वयं को उन्हयं समर्पित करके चलित करके च लिखते हैं कि एक व्यक्ति या कलाकार या कलाकार ार उन्हें पूर्णता उनके गुरु कॿकारण थऀमममव धनपत से धनपत सिंह याराय साहब हो ाय साहब हो ाो स
इज्जततलबरंगहोग्या,राजाकिसढंगहोथ
धनपततैंधनपतसिंहहोग्या,दि मनाया।
धनपत सिंह अपने गुरु को ज्ञान का भं ञान का भफ है -
धनपत सिंह ड्रामा छाँट्या,भरद सब जर पाट्या।
हे री मेरी माँ ओड़ै घाटा ना गुण ाटा नाग
जड़े विद्या का भंडार हो ।।
